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जब विनय कटियार की शिकायत करने अटल बिहारी वाजपेयी के पास पहुंच गई थीं मायावती

पहली बार 3 जून, 1995 को मायावती मुख्यमंत्री बनी थीं। उस समय प्रधानमंत्री नरसिंह राव थे। मायावती के सीएम बनने की खबर पर उनकी पहली प्रतिक्रिया थी- यह लोकतंत्र का चमत्कार है।

70 साल की हो चुकीं मायावती पहली बार 3 जून, 1995 को मुख्यमंत्री बनी थीं। तब प्रधानमंत्री थे नरसिंह राव। मायावती के सीएम बनने की खबर पर उनकी पहली प्रतिक्रिया थी- यह लोकतन्त्र का चमत्कार है। वह राज्य की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री थीं। इस लिहाज से राव को यह ‘लोकतंत्र का चमत्कार’ लगा था।

मुख्यमंत्री बनते ही मायावती के सामने पहली चुनौती बहुमत साबित करने की थी। बीजेपी ने बाहर से समर्थन कर दिया और मायावती की नैया पार हो गई। इस चुनौती से पार पाते ही मायावती ने दलित अस्मिता की राजनीति के अपने एजेंडे पर तेजी से आगे बढ़ना शुरू किया। उन्होंने प्रतीकों की राजनीति करनी शुरू की। इसके तहत सबसे पहले नाम बदलने का अभियान चलाया। तमाम संस्थानों, भवनों आदि के नाम दलित महापुरुषों के नाम पर रखे जाने लगे। दलित महापुरुषों की मूर्तियां बनवाई जाने लगीं। यहां तक कि पेरियार की प्रतिमा बनवाने तक का फरमान दे दिया। बीजेपी की ओर से विरोध हुआ तो सीएम ने दलील दी कि पेरियार दक्षिण में बेहद लोकप्रिय हैं।

बीएसपी और बीजेपी में कुछ महीने तक तो शांति रही, लेकिन उसके बाद बीजेपी की ओर से विरोध के स्वर उठने लगे। पहले तब के प्रदेश अध्यक्ष और पिछड़े वर्ग के नेता विनय कटियार की ओर से आपत्ति आनी शुरू हुई। इस बीच बसपा ने कांग्रेस के आठ विधायकों को भी तोड़ लिया और अपनी स्थिति थोड़ी मजबूत कर ली।

 

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